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mahabharat 12.307.16: हे प्रिये! जब कार्य-गुण कारण-गुणों में विलीन हो जाते हैं, तब सब कुछ एक ही प्रकृति हो जाती है। और जब क्षेत्रज्ञ भी परमात्मा में विलीन हो जाता है, तब उसका भी पृथक अस्तित्व नहीं रहता। ॥16॥   |   mahabharat अध्याय 12.307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्‍गारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्‍गारका वर्णन  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  12.307.16 
गुणा गुणेषु लीयन्ते तदैका प्रकृतिर्भवेत्।
क्षेत्रज्ञोऽपि यदा तात तत्क्षेत्रे सम्प्रलीयते॥ १६॥
 
 
अनुवाद
हे प्रिये! जब कार्य-गुण कारण-गुणों में विलीन हो जाते हैं, तब सब कुछ एक ही प्रकृति हो जाती है। और जब क्षेत्रज्ञ भी परमात्मा में विलीन हो जाता है, तब उसका भी पृथक अस्तित्व नहीं रहता। ॥16॥
 
O dear! When the qualities of effect merge with the qualities of cause, then everything becomes one and the same Prakriti. And when the knower of the field also merges with the Supreme Soul, then even he ceases to have a separate existence. ॥16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)