श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्‍गारका वर्णन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.307.15 
यदा तु गुणजालं तदव्यक्तात्मनि संक्षिपेत्।
तदा सह गुणैस्तैस्तु पञ्चविंशो विलीयते॥ १५॥
 
 
अनुवाद
जब योगी अपने योग के प्रभाव से प्रकृति के गुणों के समूह को अव्यक्त मूल प्रकृति में लीन कर देता है, तब उन गुणों के लीन होने के साथ ही पच्चीसवाँ तत्व पुरुष भी परमात्मा में लीन हो जाता है। इस दृष्टि से इसे क्षर भी कहा जा सकता है। 15॥
 
When the yogi, through the influence of his yoga, merges the set of qualities of nature into the unmanifested original nature, then along with the merging of those qualities, the twenty-fifth element Purusha also merges into the Supreme Soul. From this point of view it can also be called Kshar. 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)