श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्‍गारका वर्णन  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.307.13 
सर्गप्रलयधर्मत्वादव्यक्तं प्राहुरक्षरम्।
तदेतद् गुणसर्गाय विकुर्वाणं पुन: पुन:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
सृष्टि और संहार प्रकृति का धर्म है। इसीलिए प्रकृति को अक्षर कहा गया है। यही प्रकृति महत्तत्त्व आदि गुणों की सृष्टि के लिए बार-बार विकृत होती है। इसीलिए इसे क्षर भी कहा गया है। 13॥
 
Creation and destruction is the religion of nature. That is why nature has been called a letter. The same nature repeatedly gets distorted for the creation of qualities like Mahatattva etc. That is why it is also called Kshar. 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)