श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्‍गारका वर्णन  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  12.307.11 
उभावेवाक्षरावुक्तावुभावेतावनक्षरौ।
कारणं तु प्रवक्ष्यामि याथातथ्यं तु ज्ञानत:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
सांख्य दर्शन में प्रकृति और पुरुष दोनों को अक्षर कहा गया है और दोनों ही क्षर हैं। मैं अपने ज्ञान के अनुसार तुम्हें इसका वास्तविक कारण बताता हूँ। ॥11॥
 
In Sankhya philosophy, both nature and man are called akshara and both of them are kshara. I will tell you the real reason for this according to my knowledge. ॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)