श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 306: योग और सांख्यके स्वरूपका वर्णन तथा आत्मज्ञानसे मुक्ति  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  12.306.48 
पश्येरन्नैकमतयो न सम्यक् तेषु दर्शनम्।
ते व्यक्तं प्रतिपद्यन्ते पुन: पुनररिंदम॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
हे शत्रुराज! जिनकी बुद्धि विविधता को देखती है, उन्हें सम्यक् ज्ञान प्राप्त नहीं होता। ऐसे लोगों को बार-बार शरीर धारण करना पड़ता है। 48॥
 
Enemy King! Those whose intellect sees diversity do not attain right knowledge. Such people have to assume a body again and again. 48॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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