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श्लोक 12.306.48  |
पश्येरन्नैकमतयो न सम्यक् तेषु दर्शनम्।
ते व्यक्तं प्रतिपद्यन्ते पुन: पुनररिंदम॥ ४८॥ |
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| अनुवाद |
| हे शत्रुराज! जिनकी बुद्धि विविधता को देखती है, उन्हें सम्यक् ज्ञान प्राप्त नहीं होता। ऐसे लोगों को बार-बार शरीर धारण करना पड़ता है। 48॥ |
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| Enemy King! Those whose intellect sees diversity do not attain right knowledge. Such people have to assume a body again and again. 48॥ |
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