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श्लोक 12.306.38  |
क्षेत्रं जानाति चाव्यक्तं क्षेत्रज्ञ इति चोच्यते।
आव्यक्तिके पुरे शेते पुरुषश्चेति कथ्यते॥ ३८॥ |
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| अनुवाद |
| वह अव्यक्त क्षेत्र (प्रकृति) को जानता है, इसलिए उसे क्षेत्रज्ञ कहते हैं और प्राकृत शरीर के रोमछिद्रों में अन्तरंग रूप से शयन करने के कारण उसे 'पुरुष' कहते हैं ॥38॥ |
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| He knows the unmanifested area (nature), hence he is called Kshetragya and because of sleeping internally in the pores of the Prakrit body, he is called 'Purusha'. 38॥ |
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