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mahabharat 12.306.2: हे पापरहित मुनि! जिस परमात्मा को अज्ञानी लोग (अनेक रूपों में) जानते हैं और ज्ञानी लोग एक रूप में जानते हैं, उस परमात्मा के तत्त्व को मैं अपनी स्थूल बुद्धि के कारण नहीं समझ सकता। मेरे कथन में तनिक भी संदेह नहीं है॥2॥   |   mahabharat अध्याय 12.306: योग और सांख्यके स्वरूपका वर्णन तथा आत्मज्ञानसे मुक्ति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 306: योग और सांख्यके स्वरूपका वर्णन तथा आत्मज्ञानसे मुक्ति  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.306.2 
तथा बुद्धप्रबुद्धाभ्यां बुद्धॺमानस्य चानघ।
स्थूलबुद्धॺा न पश्यामि तत्त्वमेतन्न संशय:॥ २॥
 
 
अनुवाद
हे पापरहित मुनि! जिस परमात्मा को अज्ञानी लोग (अनेक रूपों में) जानते हैं और ज्ञानी लोग एक रूप में जानते हैं, उस परमात्मा के तत्त्व को मैं अपनी स्थूल बुद्धि के कारण नहीं समझ सकता। मेरे कथन में तनिक भी संदेह नहीं है॥2॥
 
Sinless sage! I am unable to understand the essence of the Supreme Being whom the ignorant know (in many forms) and the wise know in one form, due to my gross intellect. There is no doubt in my statement at all.॥2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)