श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 306: योग और सांख्यके स्वरूपका वर्णन तथा आत्मज्ञानसे मुक्ति  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  12.306.16-17 
न शृणोति न चाघ्राति न रंस्यति न पश्यति।
न च स्पर्शं विजानाति न संकल्पयते मन:॥ १६॥
न चाभिमन्यते किंचिन्न च बुध्यति काष्ठवत्।
तदा प्रकृतिमापन्नं युक्तमाहुर्मनीषिण:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जब वह न सुनता है, न सूंघता है, न चखता है, न देखता है, न स्पर्श का अनुभव करता है, जब उसके मन में किसी प्रकार का कोई विचार नहीं उठता तथा वह लकड़ी के टुकड़े के समान स्थिर होकर किसी भी वस्तु का अभिमान या ज्ञान नहीं करता, तभी बुद्धिमान पुरुष कहते हैं कि वह अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त हो गया है और योग में निपुण हो गया है। ॥16-17॥
 
When he neither hears, nor smells, nor tastes, nor sees, nor experiences the sense of touch, when no thought of any kind arises in his mind and, being settled like a piece of wood, he is not proud of or aware of anything, only then do the wise men say that he has attained his pure form and is adept in Yoga. ॥16-17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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