श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 306: योग और सांख्यके स्वरूपका वर्णन तथा आत्मज्ञानसे मुक्ति  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  12.306.14-15 
स्थिरीकृत्येन्द्रियग्रामं मनसा मिथिलेश्वर।
मनो बुद्धॺा स्थिरं कृत्वा पाषाण इव निश्चल:॥ १४॥
स्थाणुवच्चाप्यकम्प: स्याद् गिरिवच्चापि निश्चल:।
बुद्धॺा विधिविधानज्ञास्तदा युक्तं प्रचक्षते॥ १५॥
 
 
अनुवाद
हे मिथिलेश! जब कोई योगी अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियों को मन से और मन को बुद्धि से स्थिर कर लेता है और चट्टान के समान स्थिर, सूखे काठ के समान अचल और पर्वत के समान अविचल हो जाता है, तब शास्त्रों के नियमों को जानने वाले विद्वान पुरुष अपने अनुभव के आधार पर उसे योगज्ञ कहते हैं॥14-15॥
 
O lord of Mithilesh! When a yogi stabilizes all his senses with his mind and mind with his intellect and becomes as steady as a rock, as unshakeable as a dry piece of wood and as stable as a mountain, then the learned men who know the rules of the scriptures, on the basis of their own experience, call him a master of yoga. ॥14-15॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas