श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 306: योग और सांख्यके स्वरूपका वर्णन तथा आत्मज्ञानसे मुक्ति  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  12.306.10-11 
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यो निवर्त्य मनसा शुचि:।
दशद्वादशभिर्वापि चतुर्विंशात् परं तत:॥ १०॥
संचोदनाभिर्मतिमानात्मानं चोदयेदथ।
तिष्ठन्तमजरं तं तु यत् तदुक्तं मनीषिभि:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
बुद्धिमान योगी को चाहिए कि वह अपने मन को शुद्ध करे, श्रोता आदि इन्द्रियों को शब्द आदि से हटाकर बाईस प्रकार की प्रेरणाओं के द्वारा उस अजर आत्मा को, जिसे ज्ञानियों ने आत्मा कहा है, चौबीस तत्त्वों के समुदायरूपी स्वभाव से परे परमात्मा की ओर प्रेरित करे ॥10-11॥
 
An intelligent yogi should purify his mind, remove the senses like listener from words etc. and through twenty-two types of inspirations, inspire the ageless soul, which the wise men have described as the self, towards the Supreme Soul, beyond the community-like nature of twenty-four elements. 10-11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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