श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 305: क्षर-अक्षर एवं प्रकृति-पुरुषके विषयमें राजा जनककी शंका और उसका वसिष्ठजीद्वारा उत्तर  »  श्लोक 38-39
 
 
श्लोक  12.305.38-39 
तत्त्वनिस्तत्त्वयोरेतत् पृथगेव निदर्शनम्।
पञ्चविंशतिसर्गं तु तत्त्वमाहुर्मनीषिण:॥ ३८॥
निस्तत्त्वं पञ्चविंशस्य परमाहुर्निदर्शनम्।
सर्गस्य वर्गमाधारं तत्त्वं तत्त्वात् सनातनम्॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
तत्त्व (क्षर) और असत् (अक्षर) के इन पृथक लक्षणों को समझना चाहिए। कुछ विद्वान् पुरुष केवल पच्चीस तत्वों को ही तत्त्व कहते हैं; परन्तु अन्य विद्वानों ने चौबीस जड़ तत्वों को तत्त्व और पच्चीसवें चेतन परमेश्वर को निसत्व (तत्त्व से भिन्न) कहा है। यह चेतन ही परमेश्वर का लक्षण है। महत्तत्त्व आदि विकार क्षरतत्त्व हैं और उन क्षर तत्त्वों से भिन्न परमेश्वर परमात्मा ही उनका सनातन आधार है। 38-39॥
 
These separate characteristics of element (Kshar) and non-existence (Akshar) should be understood. Some wise men call only twenty-five elements as elements; But other scholars have called the twenty-four inanimate elements Tattva and the twenty-fifth conscious God as Nisattva (different from Tattva). This consciousness itself is the characteristic of God. The vices like Mahattattva etc. are Ksharatattva and the Supreme Being, the Supreme Soul, is their eternal basis unlike those 'Kshar' tattvas. 38-39॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वसिष्ठकरालजनकसंवादे पञ्चाधिकत्रिशततमोऽध्याय:॥ ३०५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्म पर्वमें वसिष्ठकरालजनकसंवादविषयक तीन सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३०५॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)