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mahabharat 12.305.3: दोनों के पारस्परिक सम्बन्ध के कारण एक-दूसरे के गुणों का आश्रय लेकर ही शरीर की रचना होती है। प्रायः सभी योनियों में स्थिति ऐसी ही होती है।3॥   |   mahabharat अध्याय 12.305: क्षर-अक्षर एवं प्रकृति-पुरुषके विषयमें राजा जनककी शंका और उसका वसिष्ठजीद्वारा उत्तर   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.305.3 
अन्योन्यस्याभिसम्बन्धादन्योन्यगुणसंश्रयात्।
रूपं निर्वर्तयत्येतदेवं सर्वासु योनिषु॥ ३॥
 
 
अनुवाद
दोनों के पारस्परिक सम्बन्ध के कारण एक-दूसरे के गुणों का आश्रय लेकर ही शरीर की रचना होती है। प्रायः सभी योनियों में स्थिति ऐसी ही होती है।3॥
 
A body is created only by taking support of each other's qualities due to the mutual relationship between the two. The situation is similar in almost all species. 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)