श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 305: क्षर-अक्षर एवं प्रकृति-पुरुषके विषयमें राजा जनककी शंका और उसका वसिष्ठजीद्वारा उत्तर  »  श्लोक 29-30
 
 
श्लोक  12.305.29-30 
गुणा गुणवत: सन्ति निर्गुणस्य कुतो गुणा:।
तस्मादेवं विजानन्ति ये जना गुणदर्शिन:॥ २९॥
यदा त्वेष गुणानेतान् प्राकृतानभिमन्यते।
तदा स गुणहान्यै तं परमेवानुपश्यति॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
गुण तो केवल गुणवान में ही रहते हैं। गुणहीन आत्मा में गुण कैसे रह सकते हैं? अतः गुणों के स्वरूप को जानने वाले विद्वानों का यह सिद्धांत है कि जब जीवात्मा इन गुणों को प्रकृति का कार्य मानकर उनमें अपनेपन का अभिमान त्याग देता है, उस समय वह शरीर आदि में आत्मबुद्धि का त्याग करके अपने शुद्ध दिव्य स्वरूप का साक्षात्कार करता है। 29-30॥
 
Virtues remain only in the virtuous. How can qualities remain in a soul without qualities? Therefore, it is the principle of the learned men who know the nature of qualities that when the living soul accepts these qualities as the work of nature and gives up the pride of belonging to them, at that time he gives up the self-intellect in the body etc. and realizes his pure divine form. 29-30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)