श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 305: क्षर-अक्षर एवं प्रकृति-पुरुषके विषयमें राजा जनककी शंका और उसका वसिष्ठजीद्वारा उत्तर  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  12.305.18 
तस्मात् त्वं शृणु राजेन्द्र यथैतदनुदृश्यते।
याथातथ्येन सांख्येषु योगेषु च महात्मसु॥ १८॥
 
 
अनुवाद
इसलिये राजेन्द्र! सुनो, सांख्य और योग के विशेषज्ञ महापुरुषों के मतानुसार मोक्ष का जो स्वरूप है, वही मैं तुम्हें ठीक-ठीक बता रहा हूँ॥18॥
 
That's why Rajendra! Listen, I am telling you exactly what the form of salvation is as seen in the views of great men who are experts in Sankhya and Yoga. 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)