श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 305: क्षर-अक्षर एवं प्रकृति-पुरुषके विषयमें राजा जनककी शंका और उसका वसिष्ठजीद्वारा उत्तर  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.305.14 
भारं स वहते तस्य ग्रन्थस्यार्थं न वेत्ति य:।
यस्तु ग्रन्थार्थतत्त्वज्ञो नास्य ग्रन्थागमो वृथा॥ १४॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य किसी ग्रन्थ का अर्थ नहीं समझता, वह उसे रटकर केवल उसका बोझ ढोता है; परन्तु जो उसके अर्थ का सार समझता है, उसके लिए ग्रन्थ का अध्ययन करना व्यर्थ नहीं है ॥14॥
 
One who does not understand the meaning of a text, merely carries the burden of the text by rote learning it; but for one who understands the essence of its meaning, studying the text is not futile. ॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)