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mahabharat 12.305.13: जो वेदों और शास्त्रों को कंठस्थ करने को तैयार है, परन्तु उनका वास्तविक सार नहीं समझता, उसका कंठस्थ करना व्यर्थ है ॥13॥   |   mahabharat अध्याय 12.305: क्षर-अक्षर एवं प्रकृति-पुरुषके विषयमें राजा जनककी शंका और उसका वसिष्ठजीद्वारा उत्तर   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.305.13 
यो हि वेदे च शास्त्रे च ग्रन्थधारणतत्पर:।
न च ग्रन्थार्थतत्त्वज्ञस्तस्य तद्धारणं वृथा॥ १३॥
 
 
अनुवाद
जो वेदों और शास्त्रों को कंठस्थ करने को तैयार है, परन्तु उनका वास्तविक सार नहीं समझता, उसका कंठस्थ करना व्यर्थ है ॥13॥
 
One who is ready to memorise the Vedas and the scriptures but does not understand their true essence, his memorising them is useless. ॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)