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mahabharat 12.305.10: मैं भी मोक्ष चाहता हूँ और उस परमपद को प्राप्त करना चाहता हूँ जो निर्विकार, आकाररहित, अजर, अमर, शाश्वत और इन्द्रियों से परे है और जिसने उसे प्राप्त कर लिया है, उसका कोई शासक नहीं है॥10॥   |   mahabharat अध्याय 12.305: क्षर-अक्षर एवं प्रकृति-पुरुषके विषयमें राजा जनककी शंका और उसका वसिष्ठजीद्वारा उत्तर   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.305.10 
मोक्षकामा वयं चापि काङ्क्षामो यदनामयम्।
अदेहमजरं नित्यमतीन्द्रियमनीश्वरम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
मैं भी मोक्ष चाहता हूँ और उस परमपद को प्राप्त करना चाहता हूँ जो निर्विकार, आकाररहित, अजर, अमर, शाश्वत और इन्द्रियों से परे है और जिसने उसे प्राप्त कर लिया है, उसका कोई शासक नहीं है॥10॥
 
I too desire liberation and wish to attain that supreme state which is without any change, without any form, ageless, immortal, eternal and beyond the senses and who has attained it has no ruler.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)