श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 304: प्रकृतिके संसर्गदोषसे जीवका पतन  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.304.3 
चन्द्रमा इव भूतानां पुनस्तत्र सहस्रश:।
लीयतेऽप्रतिबुद्धत्वादेवमेष ह्यबुद्धिमान्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
जैसे चन्द्रमा हजारों बार क्षीण और उदित होता है, वैसे ही अज्ञानी प्राणी भी अपने अज्ञान के कारण हजारों बार लीन (जन्म) होता है॥3॥
 
Just as the moon wanes and rises thousands of times, so too an ignorant being, due to his ignorance, dissolves (and takes birth) thousands of times.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)