श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.303.7 
यानि चान्यानि द्वन्द्वानि प्राकृतानि शरीरिषु।
उत्पद्यन्ते विचित्राणि तान्येषोऽप्यभिमन्यते॥ ७॥
 
 
अनुवाद
इनके अतिरिक्त वह अन्य सब प्रकार के विचित्र रोगों और द्वन्द्वों से भी अपने को पीड़ित मानता है, जो प्रकृति के कारण देहधारियों में उत्पन्न होते हैं ॥7॥
 
Besides these, he considers himself afflicted by all the other kinds of strange diseases and conflicts that arise in embodied beings due to nature. ॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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