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mahabharat 12.303.52: यद्यपि वह मृत्यु से सर्वथा मुक्त है, फिर भी वह अपने को मृत्युग्रस्त मानता है। यद्यपि वह अचल है, फिर भी वह अपने को चलायमान मानता है। यद्यपि वह क्षेत्र से भिन्न है, फिर भी वह अपने को क्षेत्र ही मानता है। यद्यपि उसका सृष्टि से कोई संबंध नहीं है, फिर भी वह सृष्टि को अपना ही मानता है॥ 52॥   |   mahabharat अध्याय 12.303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  12.303.52 
अमृत्युर्मृत्युमात्मानमचरश्चरमात्मन:।
अक्षेत्र: क्षेत्रमात्मानमसर्ग: सर्गमात्मन:॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि वह मृत्यु से सर्वथा मुक्त है, फिर भी वह अपने को मृत्युग्रस्त मानता है। यद्यपि वह अचल है, फिर भी वह अपने को चलायमान मानता है। यद्यपि वह क्षेत्र से भिन्न है, फिर भी वह अपने को क्षेत्र ही मानता है। यद्यपि उसका सृष्टि से कोई संबंध नहीं है, फिर भी वह सृष्टि को अपना ही मानता है॥ 52॥
 
Though he is completely free from death, he still considers himself to be death-stricken. Though he is immobile, he still considers himself to be mobile. Though he is different from the field, he still considers himself to be the field. Though he has no relation with the creation, he still considers the creation to be his own.॥ 52॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)