श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  12.303.50 
अहमेतानि वै सर्वं मय्येतानीन्द्रियाणि ह।
निरिन्द्रियो हि मन्येत व्रणवानस्मि निर्व्रण:॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
परन्तु यह जीव वास्तव में इन्द्रियों से रहित है, फिर भी यह मानता है कि मैं ही इन सब कर्मों को करता हूँ और सभी इन्द्रियाँ मेरे पास हैं। इस प्रकार दोषरहित होने पर भी यह अपने को दोषों से युक्त मानता है ॥50॥
 
But this living being is actually devoid of senses, yet it believes that it is I who performs all these actions and that it has all the senses. In this way, even though it is without flaws, it considers itself to be full of flaws. ॥ 50॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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