श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.303.5 
द्वन्द्वमेति च निर्द्वन्द्वस्तासु तास्विह योनिषु।
शीर्षरोगेऽक्षिरोगे च दन्तशूले गलग्रहे॥ ५॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि वह स्वयं सुख-दुःखरूपी द्वन्द्वों से मुक्त है, फिर भी वह नाना योनियों में जन्म लेकर सुख-दुःख भोगता है। कभी उसके सिर में दर्द होता है, कभी आँखों में, कभी दाँतों में और कभी गले में गण्डमाला हो जाती है॥5॥
 
Though he himself is free from the dualities of pleasure and pain, he experiences pleasure and pain by taking birth in different species. Sometimes he gets a headache, sometimes pain in the eyes, sometimes pain in the teeth and sometimes goitre appears in the throat.॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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