श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  12.303.48 
स लिङ्गान्तरमासाद्य प्राकृतं लिङ्गमव्रण:।
व्रणद्वाराण्यधिष्ठाय कर्मण्यात्मनि मन्यते॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
पुरुष स्वयं छिद्ररहित होकर भी प्रकृति द्वारा रचित चिह्नरूपी नाना शरीरों को धारण करता है और छिद्रों में स्थित इन्द्रियों का अधिष्ठाता बनकर उन सबकी क्रियाओं को अपने में ग्रहण करता है ॥48॥
 
Purusha himself, despite being without holes, supports the various bodies in the form of signs created by nature and by becoming the presiding deity of the senses located in the holes, he accepts the actions of all of them in himself. 48॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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