श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  12.303.47 
अलिङ्गां प्रकृतिं त्वाहुर्लिङ्गैरनुमिमीमहे।
तथैव पौरुषं लिङ्गमनुमानाद्धि मन्यते॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
ऋषिगण प्रकृति को लिंगरहित कहते हैं; परन्तु उसका अनुमान केवल विशेष कारणों से ही किया जा सकता है। इसी प्रकार पुरुष का स्वरूप अर्थात् उसका अस्तित्व भी अनुमान से ही ज्ञात होता है ॥4 7॥
 
The sages say that Prakriti is genderless; but we can infer it only through special reasons. Similarly, it is only through inference that we get to know the nature of Purusha, that is, his existence. ॥ 4 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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