Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.303.33-34: जिस त्रिगुणात्मक प्रकृति के उत्पत्ति और संहार धर्म हैं, उसे विकृत करके तीनों गुणों का स्वामी जीवात्मा कर्ममार्ग में आसक्त और उन्मुख हो जाता है और उस प्रकृति के द्वारा किये जाने वाले प्रत्येक त्रिगुणात्मक कर्म को अपना मान लेता है ॥33-34॥ | mahabharat अध्याय 12.303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
जिस त्रिगुणात्मक प्रकृति के उत्पत्ति और संहार धर्म हैं, उसे विकृत करके तीनों गुणों का स्वामी जीवात्मा कर्ममार्ग में आसक्त और उन्मुख हो जाता है और उस प्रकृति के द्वारा किये जाने वाले प्रत्येक त्रिगुणात्मक कर्म को अपना मान लेता है ॥33-34॥
By distorting the triple nature of which creation and destruction are the religions, the soul, the master of all three qualities, becomes attached and inclined towards the path of action and accepts every triple work done through that nature as its own. 33-34॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥