श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.303.3 
मानुषत्वाद् दिवं याति दिवो मानुष्यमेव च।
मानुष्यान्निरयस्थानमानन्त्यं प्रतिपद्यते॥ ३॥
 
 
अनुवाद
कभी वह मनुष्य योनि से स्वर्ग में जाता है और कभी स्वर्ग से मनुष्य योनि में लौट आता है। मनुष्य योनि से कभी-कभी वह अनंत नरकों में भी गिरता है॥3॥
 
Sometimes he goes to heaven from the human form and sometimes he returns from heaven to the human form. From the human form sometimes he even falls into infinite hells.॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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