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mahabharat 12.303.20: कभी-कभी वह सूखे पत्तों और गिरे हुए फलों पर जीवित रहता है। इस प्रकार, सफलता पाने की चाह में, वह अनेक प्रकार के कठोर नियमों का पालन करता है।   |   mahabharat अध्याय 12.303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.303.20 
वर्तयन् शीर्णपर्णैश्च प्रकीर्णफलभोजन:।
विविधानि च कृच्छ्राणि सेवते सिद्धिकाङ्क्षया॥ २०॥
 
 
अनुवाद
कभी-कभी वह सूखे पत्तों और गिरे हुए फलों पर जीवित रहता है। इस प्रकार, सफलता पाने की चाह में, वह अनेक प्रकार के कठोर नियमों का पालन करता है।
 
Sometimes he survives on dry leaves and fallen fruits. In this way, in the desire to achieve success, he follows many types of harsh rules.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)