श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  12.303.18 
मासोपवासी मूलाशी फलाहारस्तथैव च।
वायुभक्षोऽम्बुपिण्याकदधिगोमयभोजन:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
कभी वह एक महीने तक लगातार उपवास करता है। कभी वह फलों पर, कभी कंद-मूल पर निर्वाह करता है। कभी वह जल और वायु पर निर्वाह करता है। कभी वह तिल के लड्डू पर, कभी दही पर और कभी गोबर पर निर्वाह करता है॥18॥
 
Sometimes he fasts for a month continuously. Sometimes he survives on fruits and sometimes on tubers and roots. Sometimes he survives on water and air. Sometimes he survives on sesame seed cake, sometimes curd and sometimes on cow dung.॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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