श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.303.14 
फलकं परिधानश्च तथा कण्टकवस्त्रधृक्।
कीटकावसनश्चैव चीरवासास्तथैव च॥ १४॥
 
 
अनुवाद
कभी वह सन्टी की छाल का वस्त्र, कभी साधारण वस्त्र और कभी काँटों का वस्त्र धारण करता है। कभी वह कीड़ों द्वारा उत्पन्न रेशम का कोमल वस्त्र और कभी चिथड़े धारण करता है॥14॥
 
Sometimes he wears a cloth made of birch bark, sometimes ordinary cloth and sometimes a cloth made of thorns. Sometimes he wears soft cloth made of silk produced by insects and sometimes he wears rags.॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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