श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 303: प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.303.1 
वसिष्ठ उवाच
एवमप्रतिबुद्धत्वादबुद्धमनुवर्तते।
देहाद् देहसहस्राणि तथा समभिपद्यते॥ १॥
 
 
अनुवाद
वसिष्ठ कहते हैं, 'हे राजन! अज्ञानी होने के कारण आत्मा अज्ञान का ही अनुसरण करती है, इसलिए उसे एक शरीर से हजारों शरीरों में भ्रमण करना पड़ता है।
 
Vasishtha says, 'O King! Because of being ignorant, the soul follows ignorance only; therefore it has to travel from one body to thousands of bodies.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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