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mahabharat 12.301.89: प्रभु! भरतनन्दन! वह जाग्रत अवस्था की भाँति स्वप्न में भी दृश्य वस्तुओं को भलीभाँति देखता है और स्पर्शनीय वस्तुओं का स्पर्श करता है। सारांश यह है कि वह जाग्रत अवस्था में भी समस्त विषयों का उसी प्रकार अनुभव करता है ॥89॥   |   mahabharat अध्याय 12.301: सांख्ययोगके अनुसार साधन और उसके फलका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 301: सांख्ययोगके अनुसार साधन और उसके फलका वर्णन  »  श्लोक 89
 
 
श्लोक  12.301.89 
स पश्यति यथान्यायं स्पर्शान् स्पृशति वा विभो।
बुध्यमानो यथापूर्वमखिलेनेह भारत॥ ८९॥
 
 
अनुवाद
प्रभु! भरतनन्दन! वह जाग्रत अवस्था की भाँति स्वप्न में भी दृश्य वस्तुओं को भलीभाँति देखता है और स्पर्शनीय वस्तुओं का स्पर्श करता है। सारांश यह है कि वह जाग्रत अवस्था में भी समस्त विषयों का उसी प्रकार अनुभव करता है ॥89॥
 
Lord! Bharatnandan! Like in the waking state, even in dreams, he sees visible objects properly and touches tactile objects. The summary is that he experiences all the subjects in the same way as he is awake. 89॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)