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mahabharat 12.301.88: हे शत्रुओं को ताप देने वाले राजा! जब शरीरधारी जीव इन्द्रियों सहित सो जाता है, तब उसका सूक्ष्म शरीर वायु के समान आकाश में सर्वत्र विचरण करने लगता है, अर्थात् स्वप्न देखने लगता है॥88॥   |   mahabharat अध्याय 12.301: सांख्ययोगके अनुसार साधन और उसके फलका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 301: सांख्ययोगके अनुसार साधन और उसके फलका वर्णन  »  श्लोक 88
 
 
श्लोक  12.301.88 
इन्द्रियै: सह सुप्तस्य देहिन: शत्रुतापन।
सूक्ष्मश्चरति सर्वत्र नभसीव समीरण:॥ ८८॥
 
 
अनुवाद
हे शत्रुओं को ताप देने वाले राजा! जब शरीरधारी जीव इन्द्रियों सहित सो जाता है, तब उसका सूक्ष्म शरीर वायु के समान आकाश में सर्वत्र विचरण करने लगता है, अर्थात् स्वप्न देखने लगता है॥88॥
 
The king who gives heat to his enemies! When a living being with a body falls asleep along with the senses, then his subtle body starts moving everywhere in the sky like air, that is, he starts seeing dreams. 88॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)