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mahabharat 12.301.75: भरतनन्दन! कुन्तीकुमार! जो वायुदेव सूक्ष्म, शीतल, सुगन्धित, स्पर्श करने वाले और सप्त वायुओं में श्रेष्ठ हैं, वे शुभ लोकों में जाते हैं, फिर उन शुभ सांख्य योगियों को आकाश के उच्च पद पर ले जाते हैं॥75॥   |   mahabharat अध्याय 12.301: सांख्ययोगके अनुसार साधन और उसके फलका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 301: सांख्ययोगके अनुसार साधन और उसके फलका वर्णन  »  श्लोक 75
 
 
श्लोक  12.301.75 
सूक्ष्म: शीत: सुगन्धी च सुखस्पर्शश्च भारत।
सप्तानां मरुतां श्रेष्ठो लोकान् गच्छति य: शुभान्।
स तान् वहति कौन्तेय नभस: परमां गतिम्॥ ७५॥
 
 
अनुवाद
भरतनन्दन! कुन्तीकुमार! जो वायुदेव सूक्ष्म, शीतल, सुगन्धित, स्पर्श करने वाले और सप्त वायुओं में श्रेष्ठ हैं, वे शुभ लोकों में जाते हैं, फिर उन शुभ सांख्य योगियों को आकाश के उच्च पद पर ले जाते हैं॥75॥
 
Bharatnandan! Kuntikumar! The Vayudev, who is subtle, cool, fragrant, pleasant-touching and the best among the seven winds, who goes to the auspicious worlds, then takes those auspicious Sankhya Yogis to the high state of the sky. 75॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)