Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.301.64-72: हे शत्रुसूदन! तत्पश्चात् वे सिद्ध मुनि ज्ञानरूपी नौका द्वारा दुःखरूपी जल से भरे हुए इस संसाररूपी अगाध सागर को पार कर जाते हैं। वहाँ चिन्ता और शोक के बड़े-बड़े कुंड हैं। नाना प्रकार के रोग और मृत्यु विशाल मगरमच्छों के समान हैं। महाभय बड़े-बड़े सर्पों के समान है। तमोगुण कछुआ है और रजोगुण मछली है। ममता कीचड़ है। बुढ़ापा उसे पार करने में आने वाली कठिनाई है। ज्ञान उसका द्वीप है। नाना प्रकार के कर्मों से वह अथाह हो गया है। सत्य उसका किनारा है। नियम और व्रत आदि स्थिरता हैं। हिंसा उसका तेज और महान वेग है। वह नाना प्रकार के भावों का भण्डार है। नाना प्रकार के स्नेह उस भवसागर के महान रत्न हैं। दुःख और संताप वहाँ की वायु हैं। शोक और कामना के विशाल भँवर उठते रहते हैं। तीव्र रोग उसके भीतर रहने वाले महान समुद्री हाथी हैं। हड्डियाँ उसके घाट हैं। कफ झाग है। दान मोतियों का ढेर है। रक्त उसके कुंड में रहने वाला मूंगा है। हँसना और चिल्लाना उस सागर का गहन गर्जन है। अनेक प्रकार के अज्ञान ने उसे पार करना अत्यन्त कठिन बना दिया है। रोने से उत्पन्न आँसू उसमें गंदे खारे जल के समान हैं। आसक्ति का त्याग ही उसका परम आश्रय या दूसरा किनारा है। स्त्री और बच्चे जोंक के समान हैं। मित्र और सम्बन्धी किनारे के नगर हैं। अहिंसा और सत्य उसकी सीमाएँ हैं। जीवन का त्याग उसकी अशांत लहरें हैं। वेदान्त का ज्ञान ही द्वीप है। सभी प्राणियों के प्रति दया ही उसका जलराशि है। मोक्ष उसमें दुर्लभ विषय है और नाना प्रकार के दुःख उस संसार सागर की महाअग्नि हैं। हे भारतपुत्र! उसे पार करके वे आकाश रूपी शुद्ध परब्रह्म में प्रवेश करते हैं। | mahabharat अध्याय 12.301: सांख्ययोगके अनुसार साधन और उसके फलका वर्णन । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
हे शत्रुसूदन! तत्पश्चात् वे सिद्ध मुनि ज्ञानरूपी नौका द्वारा दुःखरूपी जल से भरे हुए इस संसाररूपी अगाध सागर को पार कर जाते हैं। वहाँ चिन्ता और शोक के बड़े-बड़े कुंड हैं। नाना प्रकार के रोग और मृत्यु विशाल मगरमच्छों के समान हैं। महाभय बड़े-बड़े सर्पों के समान है। तमोगुण कछुआ है और रजोगुण मछली है। ममता कीचड़ है। बुढ़ापा उसे पार करने में आने वाली कठिनाई है। ज्ञान उसका द्वीप है। नाना प्रकार के कर्मों से वह अथाह हो गया है। सत्य उसका किनारा है। नियम और व्रत आदि स्थिरता हैं। हिंसा उसका तेज और महान वेग है। वह नाना प्रकार के भावों का भण्डार है। नाना प्रकार के स्नेह उस भवसागर के महान रत्न हैं। दुःख और संताप वहाँ की वायु हैं। शोक और कामना के विशाल भँवर उठते रहते हैं। तीव्र रोग उसके भीतर रहने वाले महान समुद्री हाथी हैं। हड्डियाँ उसके घाट हैं। कफ झाग है। दान मोतियों का ढेर है। रक्त उसके कुंड में रहने वाला मूंगा है। हँसना और चिल्लाना उस सागर का गहन गर्जन है। अनेक प्रकार के अज्ञान ने उसे पार करना अत्यन्त कठिन बना दिया है। रोने से उत्पन्न आँसू उसमें गंदे खारे जल के समान हैं। आसक्ति का त्याग ही उसका परम आश्रय या दूसरा किनारा है। स्त्री और बच्चे जोंक के समान हैं। मित्र और सम्बन्धी किनारे के नगर हैं। अहिंसा और सत्य उसकी सीमाएँ हैं। जीवन का त्याग उसकी अशांत लहरें हैं। वेदान्त का ज्ञान ही द्वीप है। सभी प्राणियों के प्रति दया ही उसका जलराशि है। मोक्ष उसमें दुर्लभ विषय है और नाना प्रकार के दुःख उस संसार सागर की महाअग्नि हैं। हे भारतपुत्र! उसे पार करके वे आकाश रूपी शुद्ध परब्रह्म में प्रवेश करते हैं।
O Shatrusudana! Thereafter, those accomplished sages cross the deep ocean of the world, which is filled with the water of sorrow, with the boat of wisdom. There are big pools of worry and grief. Various types of diseases and death are like huge crocodiles. Great fear is like great snakes. Tamoguna is the turtle and Rajoguna is the fish. Affection is the mud. Old age is the difficulty in crossing it. Knowledge is its island. It has become unfathomable by various types of actions. Truth is its shore. Rules and vows etc. are stability. Violence is its fast and great speed. It is the storehouse of various types of emotions. Various types of affections are the great gems of that ocean of existence. Sorrow and anguish are the air there. Huge whirlpools of grief and desire keep rising. Acute diseases are the great sea elephants living within it. Bones are its ghats. Phlegm is foam. Charity is a pile of pearls. Blood is the coral living in its pool. Laughing and shouting is the deep roar of that ocean. Many types of ignorance have made it very difficult to cross. Tears born out of crying are like dirty salty water in it. Renunciation of attachments is the ultimate refuge or the other shore in it. Wife and children are like leeches. Friends and relatives are the cities on the banks. Non-violence and truth are its boundaries. Renunciation of life is its turbulent waves. Knowledge of Vedanta is the island. Kindness towards all creatures is its water mass. Salvation is a rare subject in it and various types of sufferings are the great fire of that world ocean. O son of Bharat! Crossing it, they enter the pure Supreme Brahman in the form of sky. 64-72.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥