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mahabharat 12.301.44-45: युधिष्ठिर! जो मनुष्य अपनी माताओं, देवताओं और सम्पूर्ण जगत् के प्रति उचित आचरण नहीं करते, उनकी दुर्दशा के ज्ञान से पापी मनुष्यों के पतन का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए तथा तिर्यग्योनिमा में पड़े हुए जीवों की नाना गतियों को भी जानना चाहिए ॥44-45॥   |   mahabharat अध्याय 12.301: सांख्ययोगके अनुसार साधन और उसके फलका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 301: सांख्ययोगके अनुसार साधन और उसके फलका वर्णन  »  श्लोक 44-45
 
 
श्लोक  12.301.44-45 
जननीषु च वर्तन्ते ये न सम्यग् युधिष्ठिर।
सदेवकेषु लोकेषु ये न वर्तन्ति मानवा:॥ ४४॥
तेन ज्ञानेन विज्ञाय गतिं चाशुभकर्मणाम्।
तिर्यग्योनिगतानां च विज्ञाय गतय: पृथक्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर! जो मनुष्य अपनी माताओं, देवताओं और सम्पूर्ण जगत् के प्रति उचित आचरण नहीं करते, उनकी दुर्दशा के ज्ञान से पापी मनुष्यों के पतन का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए तथा तिर्यग्योनिमा में पड़े हुए जीवों की नाना गतियों को भी जानना चाहिए ॥44-45॥
 
Yudhisthira! From the knowledge of the plight of those people who do not behave properly towards their mothers, gods and the entire world, one should get knowledge of the downfall of sinful people and also know the various movements of the living beings lying in Tiryagyonima. 44-45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)