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mahabharat 12.301.32-34: जीवों को नाना योनियों में अशुभ जन्म लेने पड़ते हैं। उन्हें उस अपवित्र गर्भ में रहना पड़ता है जो रक्त और मूत्र का पात्र है, जो कफ, मूत्र और मल से भरा हुआ है और जहाँ तीव्र दुर्गन्ध व्याप्त है, जो केवल रजोधर्म के रक्त और वीर्य का संग्रह है, जो मज्जा और नाड़ियों का संग्रह है, जो सैकड़ों नाड़ियों और शिराओं से भरा हुआ है और जिसके नौ द्वार हैं; उस अपवित्र नगरी अर्थात् शरीर में जीव को रहना पड़ता है। हे मनुष्यों के स्वामी! इन सब बातों को जानकर, उस आत्मा को जानना चाहिए जो स्वयं का परम कल्याण है और उसकी प्राप्ति के लिए शास्त्रों में वर्णित नाना प्रकार के योगों (साधनों) को जानना चाहिए॥ 32-34॥   |   mahabharat अध्याय 12.301: सांख्ययोगके अनुसार साधन और उसके फलका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 301: सांख्ययोगके अनुसार साधन और उसके फलका वर्णन  »  श्लोक 32-34
 
 
श्लोक  12.301.32-34 
योनीषु च विचित्रासु संसारानशुभांस्तथा।
जठरे चाशुभे वासं शोणितोदकभाजने॥ ३२॥
श्लेष्ममूत्रपुरीषे च तीव्रगन्धसमन्विते।
शुक्रशोणितसंघाते मज्जास्नायुपरिग्रहे॥ ३३॥
शिराशतसमाकीर्णे नवद्वारे पुरेऽशुचौ।
विज्ञाय हितमात्मानं योगांश्च विविधान् नृप॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
जीवों को नाना योनियों में अशुभ जन्म लेने पड़ते हैं। उन्हें उस अपवित्र गर्भ में रहना पड़ता है जो रक्त और मूत्र का पात्र है, जो कफ, मूत्र और मल से भरा हुआ है और जहाँ तीव्र दुर्गन्ध व्याप्त है, जो केवल रजोधर्म के रक्त और वीर्य का संग्रह है, जो मज्जा और नाड़ियों का संग्रह है, जो सैकड़ों नाड़ियों और शिराओं से भरा हुआ है और जिसके नौ द्वार हैं; उस अपवित्र नगरी अर्थात् शरीर में जीव को रहना पड़ता है। हे मनुष्यों के स्वामी! इन सब बातों को जानकर, उस आत्मा को जानना चाहिए जो स्वयं का परम कल्याण है और उसकी प्राप्ति के लिए शास्त्रों में वर्णित नाना प्रकार के योगों (साधनों) को जानना चाहिए॥ 32-34॥
 
Living beings have to take inauspicious births in various species. They have to live in the impure womb which is a vessel of blood and urine, which is filled with phlegm, urine and faeces and where a strong stench prevails, which is only a collection of menstrual blood and semen, which is a collection of marrow and nerves, which is filled with hundreds of nerves and veins and which has nine gates; the living being has to live in that impure city i.e. the body. O Lord of men! After knowing all these things, one should know about the soul which is the ultimate welfare of oneself and the various types of yogas (means) mentioned in the scriptures for its attainment.॥ 32-34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)