श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 301: सांख्ययोगके अनुसार साधन और उसके फलका वर्णन  » 
 
 
अध्याय 301: सांख्ययोगके अनुसार साधन और उसके फलका वर्णन
 
श्लोक 1:  युधिष्ठिर बोले, 'महाराज! आप मेरे शुभचिंतक हैं। आपने सभ्य पुरुषों के मतानुसार मुझे योगमार्ग का उचित प्रकार से वर्णन किया है।' ॥1॥
 
श्लोक 2:  अब मैं सांख्य की सम्पूर्ण विधि पूछ रहा हूँ। कृपया मुझे उसे बताने की कृपा करें, क्योंकि तीनों लोकों का सारा ज्ञान आपको ज्ञात है॥ 2॥
 
श्लोक 3:  भीष्म बोले, "युधिष्ठिर! आत्मा के तत्त्व को जानने वाले सांख्यशास्त्र के विद्वानों के इस सूक्ष्म ज्ञान को मुझसे सुनो। इसे ईश्वरकोटिक कपिल आदि सभी ऋषियों ने प्रकट किया है॥3॥
 
श्लोक 4:  हे पुरुषश्रेष्ठ! इस मत में कोई त्रुटि नहीं है। इसमें अनेक गुण हैं; किन्तु यह दोषों से सर्वथा रहित है। ॥4॥
 
श्लोक 5-17:  हे वक्ताओं में श्रेष्ठ नरेश्वर! जो मनुष्य, पिशाच, राक्षस, यक्ष, नाग, गंधर्व, पितर, तिर्यग्योनी, गरुड़, मरुद्गण, राजर्षि, ब्रह्मर्षि, असुर, विश्वेदेव, देवर्षि, योगी, प्रजापति और ब्रह्माजी तक के समस्त दुर्गम विषयों को ज्ञान के द्वारा मिथ्या जानकर संसार के मनुष्यों की नित्य अवधि और सुख के परमात्म तत्त्व तथा विषयों की इच्छा करने वाले पुरुषों का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करते हैं। समय-समय पर होने वाले दुःखों को, स्वर्ग और नरक में जाने वाले जीवों के दुःखों को, स्वर्ग के सम्पूर्ण गुण-दोषों को तथा वेदों के शास्त्रों को जानकर हम ज्ञानयोग, सांख्यज्ञान और योगमार्ग के गुण-दोषों को भी समझते हैं तथा भरतनंदन! सत्त्वगुण के दस (1), रजोगुण के नौ (2), तमोगुण के आठ (3), बुद्धि के सात (4), मन के छः (5) और आकाश के पाँच (6) गुणों का ज्ञान प्राप्त करके, बुद्धि के अन्य चार (7), तमोगुण के अन्य तीन (8), रजोगुण के अन्य दो (9) और सत्त्वगुण के पुनः एक (10) गुण को जानकर, वे आत्मा की प्राप्ति के मार्ग - प्राकृत प्रलय और आत्म-चिंतन को यथार्थ रूप से जानते हैं, वे ज्ञान-विज्ञान से युक्त होते हैं और मोक्ष प्राप्त करने में समर्थ होते हैं। पुण्यात्मा सांख्ययोगी साधनाओं के अनुष्ठान द्वारा मन से शुद्ध होकर, परम आकाश को प्राप्त होने वाले सूक्ष्म भूतों के समान शुभ मोक्ष को प्राप्त करते हैं। 5-17॥
 
श्लोक 18:  आँखें रूप और गुण से संबंधित हैं। घ्राणेन्द्रिय गंध नामक गुण से संबंधित है। श्रवणेन्द्रिय शब्द से और रसना इन्द्रिय स्वाद से संबंधित है। 18॥
 
श्लोक 19:  त्वचा स्पर्श गुणों से युक्त है। इसी प्रकार आकाश वायु का आश्रय है, तमोगुण आसक्ति का आश्रय है और लोभ इन्द्रियों का विषय है ॥19॥
 
श्लोक 20-21:  गति का आधार विष्णु हैं, बल का आधार इन्द्र हैं, उदर का आधार अग्नि है और पृथ्वीदेवी का आधार जल है। जल का तेज, वायु का तेज, वायु का आकाश, आकाश का आश्रय महत्तत्त्व है, अर्थात् महत्तत्त्व का कार्य अहंकार है और अहंकार का आधार सम्पूर्ण बुद्धि है। 20-21॥
 
श्लोक 22-23:  बुद्धि का आश्रय तमोगुण है, तमोगुण का आश्रय रजोगुण है और रजोगुण का आश्रय सत्त्वगुण है। सत्त्वगुण आत्मा के अधीन है। जीवात्मा को भगवान नारायण-देव के अधीन समझो। भगवान नारायण का आश्रय मोक्ष (परब्रह्म) है, किन्तु मोक्ष का कोई आश्रय नहीं है (वे अपनी महिमा में स्थित हैं)। 22-23॥
 
श्लोक 24-25:  इन बातों को भलीभाँति जान लो तथा सत्त्वगुण, मनसहित ग्यारह इन्द्रियाँ, पाँच प्राण - इन सोलह गुणों से युक्त सूक्ष्म शरीर, शरीर के अधीन प्रकृति और चेतना को भी जान लो। नरेश्वर! यह जान लो कि एकमात्र आत्मा, जिसमें पाप का लेशमात्र भी नहीं है, शरीर के भीतर हृदयरूपी गुफा में उदासीन भाव से स्थित है। विषयों की इच्छा रखने वाले मनुष्यों के कर्म शरीर के भीतर आत्मा से भिन्न एक अन्य तत्त्व हैं। इसे भी भलीभाँति जान लो।
 
श्लोक 26:  इन्द्रियाँ और उनके विषय सभी शरीर के भीतर स्थित हैं। मोक्ष अत्यंत दुर्लभ वस्तु है। वेदों का अध्ययन करके इन सब बातों को अच्छी तरह समझ लो।
 
श्लोक 27-28:  प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान ये पाँच प्राण हैं। अधोगामी वायु छठी और ऊर्ध्वगामी वायु जिसे प्रवाह कहते हैं, सातवीं है। इन सात प्रकार की वायुओं में से प्रत्येक के सात और प्रकार हैं। इस प्रकार कुल उनचास वायु हैं। अनेक प्रजापति, अनेक ऋषि और अनेक उत्तम मोक्ष मार्ग हैं। इन सबका ज्ञान प्राप्त करना चाहिए॥27-28॥
 
श्लोक 29:  परंतप! मनुष्य को सप्तर्षियों, अनेक राजाओं, दिव्य ऋषियों, अन्य महापुरुषों तथा सूर्य के समान तेजस्वी ब्रह्मर्षियों का भी ज्ञान प्राप्त करना चाहिए।
 
श्लोक 30-31:  पृथ्वीनाथ! महाकाल के प्रभाव से मनुष्य धन-संपत्ति से भ्रष्ट हो जाते हैं। महाभूत और समुदाय भी काल के द्वारा नष्ट कर दिए जाते हैं। यह सब देखकर और सुनकर पापियों को जो अशुभ गति प्राप्त होती है तथा यमलोक में जाकर वैतरणी नदी में गिरने वाले प्राणी जो दुःख भोगते हैं, उसे भी तू जान ले॥31॥
 
श्लोक 32-34:  जीवों को नाना योनियों में अशुभ जन्म लेने पड़ते हैं। उन्हें उस अपवित्र गर्भ में रहना पड़ता है जो रक्त और मूत्र का पात्र है, जो कफ, मूत्र और मल से भरा हुआ है और जहाँ तीव्र दुर्गन्ध व्याप्त है, जो केवल रजोधर्म के रक्त और वीर्य का संग्रह है, जो मज्जा और नाड़ियों का संग्रह है, जो सैकड़ों नाड़ियों और शिराओं से भरा हुआ है और जिसके नौ द्वार हैं; उस अपवित्र नगरी अर्थात् शरीर में जीव को रहना पड़ता है। हे मनुष्यों के स्वामी! इन सब बातों को जानकर, उस आत्मा को जानना चाहिए जो स्वयं का परम कल्याण है और उसकी प्राप्ति के लिए शास्त्रों में वर्णित नाना प्रकार के योगों (साधनों) को जानना चाहिए॥ 32-34॥
 
श्लोक 35-36h:  हे भारतश्रेष्ठ! हमें तामस, राजस और सात्विक इन तीन प्रकार के प्राणियों के मोक्ष-विरोधी आचरण को भी जानना चाहिए, जिनकी निन्दा बुद्धिमान महात्माओं ने की है।
 
श्लोक 36-37:  हे मनुष्यों के स्वामी! इस संसार में होने वाली भयंकर विपत्तियों, चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण, तारों का गिरना, तारों की गति में परिवर्तन तथा पति-पत्नी का दुःखदायी वियोग आदि को आप जान लें और अपने कल्याण के लिए उपाय करें। ॥ 36-37॥
 
श्लोक 38-39:  संसार के प्राणी एक-दूसरे को खाते हैं, यह कैसी अशुभ घटना है। इसे देखो। बाल्यावस्था में मन आसक्ति से आच्छादित रहता है और वृद्धावस्था में शरीर का अशुभ नाश होता है। आसक्ति और मोह की प्राप्ति होने पर अनेक दोष उत्पन्न होते हैं, इन सबको जानकर भी कोई-कोई ही सत्त्वगुण से युक्त देखे जाते हैं। हजारों मनुष्यों में से कोई विरला ही मोक्ष सम्बन्धी ज्ञान का आश्रय लेता है। 38-39।
 
श्लोक 40:  वेद की ऋचाओं को सुनकर मोक्ष की दुर्लभता को जानकर, इच्छित वस्तु न मिलने पर भी परिस्थिति के प्रति अधिक आदर रखना चाहिए और इच्छित वस्तु मिल जाने पर भी उसके प्रति उदासीन रहना चाहिए ॥40॥
 
श्लोक 41:  नरेश्वर! शब्द, स्पर्श आदि विषय दुःख के कारण हैं, ऐसा जान लो। कुन्तीनन्दन! जिन मनुष्यों के प्राण नष्ट हो जाते हैं, उनके शरीर की अशुभ और वीभत्स दशा को देखो। 41॥
 
श्लोक 42:  हे भारतपुत्र! घर में रहना भी एक प्रकार का दुःख है, इस बात को अच्छी तरह समझ लो और पापियों तथा ब्रह्महत्यारों की भयंकर दुर्दशा को भी जान लो॥42॥
 
श्लोक 43:  मदिरापान करने वाले दुष्ट ब्राह्मणों और गुरुजनों से विवाह करने वाले मनुष्यों के अशुभ आचरण पर भी विचार करो ॥43॥
 
श्लोक 44-45:  युधिष्ठिर! जो मनुष्य अपनी माताओं, देवताओं और सम्पूर्ण जगत् के प्रति उचित आचरण नहीं करते, उनकी दुर्दशा के ज्ञान से पापी मनुष्यों के पतन का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए तथा तिर्यग्योनिमा में पड़े हुए जीवों की नाना गतियों को भी जानना चाहिए ॥44-45॥
 
श्लोक 46-48:  वेदों की विविध विचित्र बातों पर ध्यान दो, ऋतुओं, दिन, पक्ष, मास और प्रतिक्षण बीतते हुए काल के परिवर्तन को देखो। चंद्रमा का उदय और अस्त होना स्पष्ट है। समुद्रों का ज्वार-भाटा भी स्पष्ट है। धनवानों के धन का नाश और नाश के बाद उसकी वृद्धि भी स्पष्ट है। इन सबको देखकर अपने कर्तव्य का ह्रास करो। 46-48।
 
श्लोक 49-50:  संयोगों, युगों, पर्वतों और नदियों के क्षय को देखो। रंगों के क्षय को और क्षय के अन्त को बार-बार देखो। जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था के दुःखों को देखो॥ 49-50॥
 
श्लोक 51:  शरीर के दोषों को जानने के बाद उनसे होने वाले दुःख का भी सच्चा ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। शरीर की चंचलता को ठीक से समझने का प्रयास करना चाहिए। 51॥
 
श्लोक 52:  अपने शरीर में स्थित समस्त दोषों को जानकर, शरीर से निकलती रहने वाली दुर्गन्ध का ध्यान करो (तथा विरक्त होकर ईश्वर का चिन्तन करके, अपने को भव-बन्धन से मुक्त करने का प्रयत्न करो)। 52॥
 
श्लोक 53:  युधिष्ठिर ने पूछा - "हे पितामह! आप अपने शरीर में कौन-से दोष देखते हैं? कृपा करके मेरे समस्त संदेहों का यथार्थ समाधान कीजिए।" ॥53॥
 
श्लोक 54:  भीष्म बोले - हे प्रभु! शत्रुघ्न! कपिल सांख्य दर्शन के अनुसार उत्तम मार्ग को जानने वाले ज्ञानी पुरुष इस शरीर में पाँच दोष बताते हैं। मैं तुम्हें उनके विषय में बताता हूँ, सुनो॥ 54॥
 
श्लोक 55:  काम, क्रोध, भय, निद्रा और श्वास-ये पाँच दोष सब प्राणियों के शरीर में देखे जाते हैं ॥ 55॥
 
श्लोक 56-57:  सत्पुरुष क्षमा करने से क्रोध को, संकल्प को त्यागने से काम को, सद्गुणों के सेवन से निद्रा को, प्रमाद को त्यागने से भय को और हलके भोजन से पाँचवाँ श्वासरूपी दोष नष्ट कर देते हैं ॥56-57॥
 
श्लोक 58-63:  राजन! भरतनन्दन! महाज्ञानी सांख्य विद्वान् सैकड़ों गुणों से गुणों को, सैकड़ों विकारों से दुर्गुणों को और सैकड़ों विचित्र कारणों से विचित्र कारणों को तत्त्वतः जानकर, व्यापक ज्ञान के प्रभाव से जगत् को जल के फेन के समान नाशवान, विष्णु की सैकड़ों मायाओं से आवृत, दीवार पर लगे चित्र के समान असार, नरक के समान असार, अंधकार से भरे हुए गड्ढे के समान भयंकर, वर्षा ऋतु में जल के बुदबुदों के समान क्षणभंगुर, सुख से रहित, कीचड़ में फँसे हुए हाथी के समान, विनाश के आश्रित, रजोगुण और तमोगुण में लीन मानते हैं। अतः वे संतान आदि की आसक्ति को दूर करके, तपरूपी तप से संयुक्त बुद्धिरूपी शस्त्र द्वारा राजस-तमस की अशुभ गंधों को, सुन्दर एवं मनोहर सात्त्विक गंधों को तथा स्पर्शेन्द्रिय के शारीरिक सुखों की आसक्ति को शीघ्र ही काट डालते हैं।
 
श्लोक 64-72:  हे शत्रुसूदन! तत्पश्चात् वे सिद्ध मुनि ज्ञानरूपी नौका द्वारा दुःखरूपी जल से भरे हुए इस संसाररूपी अगाध सागर को पार कर जाते हैं। वहाँ चिन्ता और शोक के बड़े-बड़े कुंड हैं। नाना प्रकार के रोग और मृत्यु विशाल मगरमच्छों के समान हैं। महाभय बड़े-बड़े सर्पों के समान है। तमोगुण कछुआ है और रजोगुण मछली है। ममता कीचड़ है। बुढ़ापा उसे पार करने में आने वाली कठिनाई है। ज्ञान उसका द्वीप है। नाना प्रकार के कर्मों से वह अथाह हो गया है। सत्य उसका किनारा है। नियम और व्रत आदि स्थिरता हैं। हिंसा उसका तेज और महान वेग है। वह नाना प्रकार के भावों का भण्डार है। नाना प्रकार के स्नेह उस भवसागर के महान रत्न हैं। दुःख और संताप वहाँ की वायु हैं। शोक और कामना के विशाल भँवर उठते रहते हैं। तीव्र रोग उसके भीतर रहने वाले महान समुद्री हाथी हैं। हड्डियाँ उसके घाट हैं। कफ झाग है। दान मोतियों का ढेर है। रक्त उसके कुंड में रहने वाला मूंगा है। हँसना और चिल्लाना उस सागर का गहन गर्जन है। अनेक प्रकार के अज्ञान ने उसे पार करना अत्यन्त कठिन बना दिया है। रोने से उत्पन्न आँसू उसमें गंदे खारे जल के समान हैं। आसक्ति का त्याग ही उसका परम आश्रय या दूसरा किनारा है। स्त्री और बच्चे जोंक के समान हैं। मित्र और सम्बन्धी किनारे के नगर हैं। अहिंसा और सत्य उसकी सीमाएँ हैं। जीवन का त्याग उसकी अशांत लहरें हैं। वेदान्त का ज्ञान ही द्वीप है। सभी प्राणियों के प्रति दया ही उसका जलराशि है। मोक्ष उसमें दुर्लभ विषय है और नाना प्रकार के दुःख उस संसार सागर की महाअग्नि हैं। हे भारतपुत्र! उसे पार करके वे आकाश रूपी शुद्ध परब्रह्म में प्रवेश करते हैं।
 
श्लोक 73:  राजन! सूर्य अपनी किरणों के द्वारा उन पुण्यात्मा सांख्ययोगी सिद्धपुरुषों में प्रवेश करके उन्हें अर्चिरा मार्ग से ऊपर के लोकों में उसी प्रकार ले जाता है, जैसे कमल का तना सरोवर से जल खींच लेता है।
 
श्लोक 74:  वहाँ पर प्रवाहन नामक अभिमानी वायुदेव उन वीतराग शक्ति से सम्पन्न, सिद्ध तपोधन महापुरुषों को अभिमानी सूर्य नामक देवता से अपने अधीन कर लेते हैं ॥74॥
 
श्लोक 75:  भरतनन्दन! कुन्तीकुमार! जो वायुदेव सूक्ष्म, शीतल, सुगन्धित, स्पर्श करने वाले और सप्त वायुओं में श्रेष्ठ हैं, वे शुभ लोकों में जाते हैं, फिर उन शुभ सांख्य योगियों को आकाश के उच्च पद पर ले जाते हैं॥75॥
 
श्लोक 76-78:  लोकेश्वर! आकाशगामी भगवान् उन योगियों को रजोगुण की परम गति प्रदान करते हैं। अर्थात् तेजोमय विद्युत् अभिमानी देवताओं को प्राप्त हो जाती है। राजेन्द्र! वह रजोगुण अर्थात् विद्युत् का अभिमानी भगवान् उन्हें सत्य के परमपद तक ले जाता है, अर्थात् जहाँ श्री नारायण के पार्षद उन्हें ले जाने के लिए तत्पर रहते हैं। शुद्धात्मा! वहाँ से वे सद्गुणों वाले भगवान् के पार्षद उन्हें परम पुरुष श्री नारायण के पास ले जाते हैं। समर्थ राजन्! भगवान् नारायण स्वयं उन्हें शुद्धात्मा परब्रह्म परमात्मा में प्रविष्ट करा देते हैं। परमात्मा को प्राप्त होकर वे शुद्ध योगी उसी प्रकार परिणत होकर अमृत से युक्त हो जाते हैं और फिर कभी लौटकर नहीं आते। 76-78॥
 
श्लोक 79:  हे कुन्तीपुत्र! जो महापुरुष सब प्रकार के द्वन्द्वों से रहित, सत्यवादी, सरल और सब प्राणियों पर दया करने वाले हैं, वे उसी परम मोक्ष को प्राप्त होते हैं॥ 79॥
 
श्लोक 80-81:  युधिष्ठिर ने पूछा, "हे निष्पाप पितामह! जो महान सांख्य योगी पुरुष दृढतापूर्वक उत्तम व्रतों का पालन करते हैं, वे भगवान नारायण तथा भगवान के परमपद (मोक्ष) को प्राप्त होकर, जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त अपने जीवन की घटनाओं को कभी स्मरण रखते हैं या नहीं?" (मोक्ष की अवस्था में मनुष्य को कुछ बातों का ज्ञान होता है या नहीं? यह मेरा प्रश्न है।) कृपया मुझे इस विषय में विस्तारपूर्वक तथ्य बताएँ। हे कुरुपुत्र! मैं आपके अतिरिक्त अन्य किसी से ऐसा प्रश्न नहीं पूछ सकता।
 
श्लोक 82-83:  सिद्धावस्था प्राप्त हुए मुनियों के लिए मोक्ष में यह बड़ा दोष प्रतीत होता है। अर्थात् यदि मोक्ष प्राप्त करके भी वे तपस्वी विशेष ज्ञान में विचरण करते हैं, अर्थात् पूर्वकाल का स्मरण करते हैं, तो मैं प्रवृत्तिरूप धर्म को ही श्रेष्ठ मानता हूँ। यदि, मान लीजिए, मुक्त अवस्था में विशेष ज्ञान का अनुभव नहीं होता, तो उस परम ज्ञान में लीन होने पर विशेष ज्ञान का अभाव हो जाता है, इससे बड़ा दुःख और क्या हो सकता है?॥82-83॥
 
श्लोक 84:  भीष्मजी बोले - तात! भरतश्रेष्ठ! आपने इस अत्यन्त जटिल प्रश्न को यथोचित ढंग से प्रस्तुत किया है। बड़े-बड़े विद्वान् भी इस प्रश्न पर विचार करते हुए मोहित हो जाते हैं। 84॥
 
श्लोक 85:  सुनो, मैं इस विषय में परम सत्य को विस्तारपूर्वक कह ​​रहा हूँ। यहाँ कपिलजी द्वारा प्रतिपादित सांख्य दर्शन का पालन करने वाले महापुरुषों का उत्तम मत प्रस्तुत कर रहा हूँ। ॥85॥
 
श्लोक 86:  हे मनुष्यों के स्वामी! जीवों के शरीर में स्थित इन्द्रियाँ ही विशेष विषयों को देखने या अनुभव करने वाली हैं। वे ही आत्मा को नाना प्रकार के ज्ञान की प्राप्ति का कारण हैं, क्योंकि सूक्ष्मात्मा उन्हीं इन्द्रियों के द्वारा बाह्य विषयों को देखता या अनुभव करता है (मुक्त अवस्था में मन और इन्द्रियों से सम्बन्ध न रहने के कारण उसमें इन्द्रियों द्वारा उत्पन्न विशेष ज्ञान का अभाव देखा जाता है)। ॥86॥
 
श्लोक 87:  जैसे समुद्र में उठने वाला झाग लुप्त हो जाता है, वैसे ही आत्मा से अलग होकर मनुष्य की जड़ इन्द्रियाँ लकड़ी या दीवार के समान प्रकृति में विलीन हो जाती हैं; इसमें कोई संदेह नहीं है ॥ 87॥
 
श्लोक 88:  हे शत्रुओं को ताप देने वाले राजा! जब शरीरधारी जीव इन्द्रियों सहित सो जाता है, तब उसका सूक्ष्म शरीर वायु के समान आकाश में सर्वत्र विचरण करने लगता है, अर्थात् स्वप्न देखने लगता है॥88॥
 
श्लोक 89:  प्रभु! भरतनन्दन! वह जाग्रत अवस्था की भाँति स्वप्न में भी दृश्य वस्तुओं को भलीभाँति देखता है और स्पर्शनीय वस्तुओं का स्पर्श करता है। सारांश यह है कि वह जाग्रत अवस्था में भी समस्त विषयों का उसी प्रकार अनुभव करता है ॥89॥
 
श्लोक 90:  फिर जब गहरी नींद की अवस्था होती है, तब विषय को जानने में असमर्थ होकर सारी इन्द्रियाँ अपने-अपने स्थान में उसी प्रकार लीन हो जाती हैं, जैसे विषहीन सर्प (भय से) छिपे रहते हैं। 90॥
 
श्लोक 91:  इसमें कोई संदेह नहीं कि स्वप्नावस्था में जीवात्मा अपने-अपने स्थानों में स्थित समस्त इन्द्रियों की गतियों को प्रभावित करके सूक्ष्म विषयों में विचरण करता है ॥91॥
 
श्लोक 92-96:  भरतनन्दन! धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर! परमेश्वर सात्त्विक, राजस और तामस गुणों को तथा बुद्धि, मन, आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी आदि सम्पूर्ण पदार्थों को अपने गुणों द्वारा व्याप्त करके समस्त क्षेत्रज्ञों (जीवों) में स्थित हैं, हे प्रभु! जैसे शिष्य अपने गुरु का अनुसरण करते हैं, वैसे ही मन, इन्द्रियाँ और शुभ-अशुभ कर्म भी उस आत्मा का अनुसरण करते हैं। जब आत्मा इन्द्रियों और प्रकृति से परे हो जाती है, तब वह नारायण रूप अविनाशी परमेश्वर को प्राप्त होती है, जो द्वन्द्व से रहित और मोह से परे है। 92-96॥
 
श्लोक 97:  भारत! जब सांख्य योगी पाप-पुण्य से मुक्त होकर उसी निर्गुण और अपरिवर्तनशील भगवान नारायण में प्रवेश करता है, तब वह इस संसार में फिर कभी नहीं लौटता ॥97॥
 
श्लोक 98:  हे भरतनन्दन! इस प्रकार मुक्तात्मा का आत्मा परमात्मा में लीन हो जाता है, परन्तु प्रारब्धवश जब तक शरीर रहता है, तब तक उसके मन और इन्द्रियाँ रहती हैं और गुरु की आज्ञा का पालन करने वाले शिष्यों की भाँति वे समयानुसार यहाँ आते-जाते रहते हैं॥ 98॥
 
श्लोक 99:  कुन्तीनन्दन! इस प्रकार दिए गए ज्ञान से मोक्ष प्राप्त और आध्यात्मिक उन्नति की इच्छा रखने वाला मनुष्य थोड़े ही समय में परम शांति प्राप्त कर लेता है।
 
श्लोक 100:  राजन! कुन्तीपुत्र! महाज्ञानी सांख्य योगी ऊपर वर्णित परमपद को प्राप्त करते हैं। इस ज्ञान के समान दूसरा कोई ज्ञान नहीं है ॥100॥
 
श्लोक 101:  सांख्य ज्ञान सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इस विषय में तुम्हें कोई संदेह नहीं करना चाहिए। यह नित्य, स्थायी और अपरिवर्तनशील ब्रह्म का प्रतिपादन करता है॥101॥
 
श्लोक 102:  वह ब्रह्म आदि, मध्य और अन्त से रहित, द्वंद्वरहित, जगत् की उत्पत्ति का कारण, अनादि, नित्य और सनातन है, ऐसा ज्ञानी पुरुष कहते हैं ॥102॥
 
श्लोक 103:  जगत् की उत्पत्ति और प्रलयरूपी समस्त विकार उन्हीं के द्वारा संभव हैं। महर्षि अपने शास्त्रों में उनकी स्तुति करते हैं ॥103॥
 
श्लोक 104-105:  सभी ब्राह्मण, देवता और शांति का अनुभव करने वाले मनुष्य उसी अनंत, अच्युत, ब्राह्मण-हितैषी और परमपिता परमात्मा की प्रार्थना करते हैं। उनके गुणों का चिंतन करते हुए हम उनकी महिमा गाते हैं। योग में महान सिद्धि प्राप्त योगी और अपार ज्ञान वाले सांख्यवेत्ता पुरुष भी उनकी स्तुति गाते हैं।
 
श्लोक 106:  कुन्तीनन्दन! यह प्रसिद्ध है कि यह सांख्यशास्त्र स्वयं उस निराकार परमेश्वर का ही स्वरूप है। भारतश्रेष्ठ! जो भी ज्ञान है, वह सब सांख्यशास्त्र की मान्यता का ही प्रतिपादन करता है। 106॥
 
श्लोक 107:  पृथ्वीनाथ! इस पृथ्वी पर दो प्रकार के प्राणी हैं - स्थावर और जंगम। उनमें भी जंगम प्राणी श्रेष्ठ हैं ॥107॥
 
श्लोक 108:  हे राजन! हे मनुष्यों के स्वामी! महात्माओं में, वेदों में, सांख्यों में, योगशास्त्र में तथा पुराणों में जो नाना प्रकार का उत्तम ज्ञान देखा जाता है, वह सब सांख्य से ही उत्पन्न हुआ है।
 
श्लोक 109:  हे राजन! हे महात्मा! महान् इतिहासों में, सज्जनों द्वारा परोसे गए अर्थशास्त्र में तथा इस लोक में जो भी महान् ज्ञान देखा जाता है, वह सब सांख्य के द्वारा ही प्राप्त हुआ है ॥109॥
 
श्लोक 110:  राजन! मन और इन्द्रियों का प्रत्यक्ष संयम, श्रेष्ठ बल, सूक्ष्म ज्ञान और फलस्वरूप सुख देने वाले सूक्ष्म तप, इन सबका वर्णन सांख्यशास्त्र में भली-भाँति किया गया है ॥110॥
 
श्लोक 111:  कुन्तीकुमार! यदि साधना में किसी त्रुटि के कारण सांख्य का सम्यक् ज्ञान प्राप्त न भी हो, तो भी सांख्ययोग का साधक अवश्य ही देवलोक में जाता है और वहाँ सुखपूर्वक निवास करके देवताओं का राज्य प्राप्त करता है। तदनन्तर, पुण्य का क्षय होने पर, वे इस लोक में आकर पुनः साधन-प्रयत्न करने वाले ब्राह्मणों के घर में जन्म लेते हैं। 111॥
 
श्लोक 112:  पार्थ! शरीर त्यागने के पश्चात् सांख्य के ज्ञाता पुरुष उसी प्रकार परब्रह्म परमात्मा में प्रवेश करते हैं, जैसे देवता स्वर्ग में प्रवेश करते हैं। पृथ्वीनाथ! इसलिए वे सभी ब्राह्मण सुसंस्कृत पुरुषों द्वारा सेवित परम पूजनीय सांख्यशास्त्र में ही आसक्त रहते हैं ॥112॥
 
श्लोक 113:  राजन! जो इस सांख्य-ज्ञान में तत्पर रहते हैं, वे ही प्रधान ब्राह्मण हैं। अतः ऐसा कभी नहीं देखा गया कि उन्हें मृत्यु के पश्चात पशु-पक्षी आदि योनियों में जाना पड़े। वे कभी नरक की निम्न गतियों को प्राप्त नहीं होते और उन्हें पापियों के बीच नहीं रहना पड़ता ॥113॥
 
श्लोक 114:  सांख्य का ज्ञान अत्यन्त विशाल और प्राचीन है। यह समुद्र के समान गम्भीर, पवित्र, उदार भावनाओं से युक्त और अत्यन्त सुन्दर है। नरनाथ! इस सम्पूर्ण अविनाशी ज्ञान को पूर्णतया परमेश्वर भगवान नारायण ही धारण करते हैं। 114॥
 
श्लोक 115-116:  नरदेव! मैंने तुम्हें सांख्य का यह सिद्धांत बताया है। इस आदि जगत् के रूप में भगवान नारायण सर्वत्र विद्यमान हैं। वे ही सृष्टि के समय जगत् की रचना करते हैं और प्रलय के समय उसे अपने में लीन कर लेते हैं। इस प्रकार वे जगत् को अपने शरीर में स्थापित करके जगत् के अंतर्यामी भगवान नारायण एकार्णव के जल में शयन करते हैं। 115-116॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)