श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 300: सांख्य और योगका अन्तर बतलाते हुए योगमार्गके स्वरूप साधन,फल और प्रभावका वर्णन  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  12.300.56 
यस्तु तिष्ठति कौन्तेय धारणासु यथाविधि।
मरणं जन्म दु:खं च सुखं च स विमुञ्चति॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! जो मनुष्य विधिपूर्वक योग के नियमों में स्थिर रहता है, वह जन्म, मृत्यु, दुःख और सुख के बन्धनों से मुक्त हो जाता है ॥ 56॥
 
O son of Kunti! He who remains steadfast in the principles of Yoga as per the prescribed method, gets freedom from the bondages of birth, death, pain and pleasure. ॥ 56॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)