यस्तु तिष्ठति कौन्तेय धारणासु यथाविधि।
मरणं जन्म दु:खं च सुखं च स विमुञ्चति॥ ५६॥
अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! जो मनुष्य विधिपूर्वक योग के नियमों में स्थिर रहता है, वह जन्म, मृत्यु, दुःख और सुख के बन्धनों से मुक्त हो जाता है ॥ 56॥
O son of Kunti! He who remains steadfast in the principles of Yoga as per the prescribed method, gets freedom from the bondages of birth, death, pain and pleasure. ॥ 56॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥