श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 300: सांख्य और योगका अन्तर बतलाते हुए योगमार्गके स्वरूप साधन,फल और प्रभावका वर्णन  »  श्लोक 39-41
 
 
श्लोक  12.300.39-41 
नाभ्यां कण्ठे च शीर्षे च हृदि वक्षसि पार्श्वयो:।
दर्शने श्रवणे चापि घ्राणे चामितविक्रम॥ ३९॥
स्थानेष्वेतेषु यो योगी महाव्रतसमाहित:।
आत्मना सूक्ष्ममात्मानं युङ्‍‍क्ते सम्यग्विशाम्पते॥ ४०॥
स शीघ्रमचलप्रख्यं कर्म दग्ध्वा शुभाशुभम्।
उत्तमं योगमास्थाय यदीच्छति विमुच्यते॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
हे महाबली राजन! जो योगी योग के महान व्रत में एकाग्रचित्त रहता है और नाभि, कण्ठ, ललाट, हृदय, वक्षस्थल, पार्श्व, नेत्र, कर्ण और नासिका में धारणा द्वारा सूक्ष्म आत्मा को परमात्मा के साथ भलीभाँति एक कर लेता है, वह चाहे तो अपने पर्वत के समान विशाल शुभ-अशुभ कर्मों को शीघ्र ही जलाकर उत्तम योग का आश्रय लेकर मुक्त हो जाता है। 39-41॥
 
Oh mighty king! The yogi who remains concentrated during the great fast of Yoga and who, through Dharna in the navel, throat, forehead, heart, chest area, sides, eyes, ears and nostrils, thoroughly unites the subtle soul with the Supreme Soul, if he wishes, he can quickly burn away his mountain-like huge good and bad deeds and becomes free by taking the shelter of the best Yoga. 39-41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)