श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 300: सांख्य और योगका अन्तर बतलाते हुए योगमार्गके स्वरूप साधन,फल और प्रभावका वर्णन  »  श्लोक 34-35
 
 
श्लोक  12.300.34-35 
यथा च नावं कौन्तेय कर्णधार: समाहित:।
महार्णवगतां शीघ्रं नयेत् पार्थिवसत्तम॥ ३४॥
तद्वदात्मसमाधानं युक्त्वा योगेन तत्त्ववित्।
दुर्गमं स्थानमाप्नोति हित्वा देहमिमं नृप॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
कुन्तीकुमार! श्रेष्ठ! जैसे सावधान नाविक समुद्र में पड़ी हुई नाव को शीघ्र ही किनारे पर लगा देता है, उसी प्रकार योग के अनुसार तत्व को जानने वाला पुरुष समाधि के द्वारा भगवान् में मन को एकाग्र करके इस शरीर को त्यागकर दुर्गम स्थान (परमधाम) को प्राप्त होता है। 34-35॥
 
Kuntikumar! The best! Just as a careful sailor quickly puts a boat lying in the sea on the shore, in the same way, according to Yoga, a person who knows the essence, by concentrating his mind on God through Samadhi, attains the inaccessible place (Paramdham) after renouncing this body. 34-35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)