श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 300: सांख्य और योगका अन्तर बतलाते हुए योगमार्गके स्वरूप साधन,फल और प्रभावका वर्णन  »  श्लोक 32-33
 
 
श्लोक  12.300.32-33 
स्नेहपूर्णे यथा पात्रे मन आधाय निश्चलम्।
पुरुषो युक्त आरोहेत् सोपानं युक्तमानस:॥ ३२॥
युक्तस्तथायमात्मानं योग: पार्थिव निश्चलम्।
करोत्यमलमात्मानं भास्करोपमदर्शनम्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
पृथ्वीनाथ! जैसे सिर पर रखे हुए तेल के पात्र में मन को स्थिर करके मन को एकाग्रचित्त होकर सीढ़ियाँ चढ़ता है और तेल की एक बूँद भी नहीं गिराता, वैसे ही जब कोई योगी योग में तल्लीन होकर अपनी आत्मा को परमात्मा में स्थिर करता है, तब उसकी आत्मा अचल सूर्य के समान शुद्ध और तेजस्वी हो जाती है॥32-33॥
 
Prithvinath! Just as a man who keeps his mind firmly fixed on the oil vessel kept on his head, climbs the stairs with full concentration and does not spill even a drop of oil, similarly, when a yogi, being absorbed in yoga, fixes his soul on the Supreme Soul, then his soul becomes as pure and radiant as the immovable Sun. ॥32-33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)