श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 300: सांख्य और योगका अन्तर बतलाते हुए योगमार्गके स्वरूप साधन,फल और प्रभावका वर्णन  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  12.300.31 
अप्रमत्तो तथा धन्वी लक्ष्यं हन्ति समाहित:।
युक्त: सम्यक् तथा योगी मोक्षं प्राप्नोत्यसंशयम्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
जैसे सदैव सतर्क रहने वाला, एकाग्र मन वाला वीर धनुर्धर बाण अवश्य ही लक्ष्य पर लगता है, वैसे ही जो योगी अपने मन को परमात्मा में एकाग्र करता है, वह अवश्य ही मोक्ष प्राप्त करता है ॥31॥
 
Just as a brave archer who is always alert and concentrates his mind and shoots an arrow, surely hits the target, similarly, a Yogi who concentrates his mind on the Supreme Being, surely attains salvation. ॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)