अनीश्वर: कथं मुच्येदित्येवं शत्रुकर्शन।
वदन्ति कारणै: श्रैष्ठॺं योगा: सम्यङ्मनीषिण:॥ ३॥
अनुवाद
शत्रुसूदन! योग के विद्वान् विद्वान् अपने मत की श्रेष्ठता बताते हुए यह सुझाव प्रस्तुत करते हैं कि ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार किए बिना कोई कैसे मुक्त हो सकता है? (अतः मोक्ष देने वाले ईश्वर की सत्ता को अवश्य स्वीकार करना चाहिए)॥3॥
Shatrusudan! The wise scholars of Yoga, while stating the superiority of their opinion, present this suggestion that how can anyone be liberated without accepting the existence of God? (Therefore, the authority of the God who gives salvation must be accepted)॥ 3॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥