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mahabharat 12.300.3: शत्रुसूदन! योग के विद्वान् विद्वान् अपने मत की श्रेष्ठता बताते हुए यह सुझाव प्रस्तुत करते हैं कि ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार किए बिना कोई कैसे मुक्त हो सकता है? (अतः मोक्ष देने वाले ईश्वर की सत्ता को अवश्य स्वीकार करना चाहिए)॥3॥   |   mahabharat अध्याय 12.300: सांख्य और योगका अन्तर बतलाते हुए योगमार्गके स्वरूप साधन,फल और प्रभावका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 300: सांख्य और योगका अन्तर बतलाते हुए योगमार्गके स्वरूप साधन,फल और प्रभावका वर्णन  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.300.3 
अनीश्वर: कथं मुच्येदित्येवं शत्रुकर्शन।
वदन्ति कारणै: श्रैष्ठॺं योगा: सम्यङ्मनीषिण:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
शत्रुसूदन! योग के विद्वान् विद्वान् अपने मत की श्रेष्ठता बताते हुए यह सुझाव प्रस्तुत करते हैं कि ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार किए बिना कोई कैसे मुक्त हो सकता है? (अतः मोक्ष देने वाले ईश्वर की सत्ता को अवश्य स्वीकार करना चाहिए)॥3॥
 
Shatrusudan! The wise scholars of Yoga, while stating the superiority of their opinion, present this suggestion that how can anyone be liberated without accepting the existence of God? (Therefore, the authority of the God who gives salvation must be accepted)॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)