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mahabharat 12.300.15: हे मनुष्यों के स्वामी! जैसे दुर्बल मृग आदि पशु जाल में फँसकर अवश्य ही नष्ट हो जाते हैं, वैसी ही दशा योगबल से रहित मनुष्य की होती है ॥15॥   |   mahabharat अध्याय 12.300: सांख्य और योगका अन्तर बतलाते हुए योगमार्गके स्वरूप साधन,फल और प्रभावका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 300: सांख्य और योगका अन्तर बतलाते हुए योगमार्गके स्वरूप साधन,फल और प्रभावका वर्णन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.300.15 
अबलाश्च मृगा राजन् वागुरासु तथा परे।
विनश्यन्ति न संदेहस्तद्वद् योगबलादृते॥ १५॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! जैसे दुर्बल मृग आदि पशु जाल में फँसकर अवश्य ही नष्ट हो जाते हैं, वैसी ही दशा योगबल से रहित मनुष्य की होती है ॥15॥
 
O Lord of men! Just as a weak deer and other animals fall into a trap and surely perish, so is the condition of a man devoid of the power of yoga. ॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)