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mahabharat 12.300.10: युधिष्ठिर ने पूछा - पितामह! यदि इन दोनों मतों में उत्तम व्रत, भीतर-बाहर की पवित्रता तथा दया एक ही है और दोनों का फल भी एक ही है, तो फिर इनके दर्शनों में समानता क्यों नहीं है, यह कृपा करके मुझे बताइए॥10॥   |   mahabharat अध्याय 12.300: सांख्य और योगका अन्तर बतलाते हुए योगमार्गके स्वरूप साधन,फल और प्रभावका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 300: सांख्य और योगका अन्तर बतलाते हुए योगमार्गके स्वरूप साधन,फल और प्रभावका वर्णन  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  12.300.10 
युधिष्ठिर उवाच
यदि तुल्यं व्रतं शौचं दया चात्र फलं तथा।
न तुल्यं दर्शनं कस्मात् तन्मे ब्रूहि पितामह॥ १०॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा - पितामह! यदि इन दोनों मतों में उत्तम व्रत, भीतर-बाहर की पवित्रता तथा दया एक ही है और दोनों का फल भी एक ही है, तो फिर इनके दर्शनों में समानता क्यों नहीं है, यह कृपा करके मुझे बताइए॥10॥
 
Yudhishthira asked - Grandfather! If in both these beliefs, good vows, purity inside and outside and compassion are the same and the result of both is also the same, then why is there no similarity in their philosophies, please tell me this.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)