श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 30: महर्षि नारद और पर्वतका उपाख्यान  »  श्लोक 11-14h
 
 
श्लोक  12.30.11-14h 
तथेति कृत्वा राजा तौ सत्कृत्योपचचार ह॥ ११॥
तत: कदाचित्तौ राजा महात्मानौ तपोधनौ।
अब्रवीत् परमप्रीत: सुतेयं वरवर्णिनी॥ १२॥
एकैव मम कन्यैषा युवां परिचरिष्यसि।
दर्शनीयानवद्याङ्गी शीलवृत्तसमाहिता॥ १३॥
सुकुमारी कुमारी च पद्मकिञ्जल्कसुप्रभा।
 
 
अनुवाद
तब राजा ने 'बहुत अच्छा' कहकर उन दोनों का बड़े आदरपूर्वक पूजन किया। तत्पश्चात एक दिन राजा संजय ने प्रसन्न होकर उन दोनों तपस्वी मुनियों से कहा - 'महर्षिओ! यह मेरी एकमात्र पुत्री है, जो अत्यंत सुन्दर, आकर्षक, दोषरहित शरीर वाली, सदाचारी एवं शीलवान है। कमल और केसर के समान कान्ति वाली यह सुकुमारी कन्या आज से आप दोनों की सेवा करेगी।'
 
Then saying 'very good' the king worshipped them both with great respect. Thereafter one day King Sanjaya was very pleased and said to those two ascetic saints - 'Maharishis! This is my only daughter, who is extremely beautiful, attractive, has flawless body parts and is endowed with good conduct and modesty. This delicate girl with radiance like that of lotus and saffron will serve you both from today'.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)