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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 3: कर्णको ब्रह्मास्त्रकी प्राप्ति और परशुरामजीका शाप
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श्लोक 8
श्लोक
12.3.8
संदश्यमानस्तु तथा कृमिणा तेन भारत।
गुरो: प्रबोधनाशङ्की तमुपैक्षत सूर्यज:॥ ८॥
अनुवाद
हे भरतपुत्र! वह कीड़ा बार-बार उन्हें काटता रहा, किन्तु सूर्यपुत्र कर्ण ने इस भय से उसकी उपेक्षा की कि कहीं उनके गुरु जाग न जाएँ।
O son of Bharat! The insect kept biting him again and again, but Suryaputra Karna ignored it fearing that his Guru might wake up.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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