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mahabharat 12.3.31-32: जो ब्राह्मण नहीं है, उसके हृदय में ब्रह्मास्त्र कभी स्थिर नहीं रह सकता। अब तुम यहाँ से चले जाओ। झूठे, यहाँ तुम्हारे लिए कोई स्थान नहीं है, परन्तु मेरे आशीर्वाद से इस पृथ्वी पर कोई भी क्षत्रिय युद्ध में तुम्हारे समान नहीं होगा।॥31-32॥   |   mahabharat अध्याय 12.3: कर्णको ब्रह्मास्त्रकी प्राप्ति और परशुरामजीका शाप   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 3: कर्णको ब्रह्मास्त्रकी प्राप्ति और परशुरामजीका शाप  »  श्लोक 31-32
 
 
श्लोक  12.3.31-32 
अब्राह्मणे न हि ब्रह्म ध्रुवं तिष्ठेत् कदाचन॥ ३१॥
गच्छेदानीं न ते स्थानमनृतस्येह विद्यते।
न त्वया सदृशो युद्धे भविता क्षत्रियो भुवि॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
जो ब्राह्मण नहीं है, उसके हृदय में ब्रह्मास्त्र कभी स्थिर नहीं रह सकता। अब तुम यहाँ से चले जाओ। झूठे, यहाँ तुम्हारे लिए कोई स्थान नहीं है, परन्तु मेरे आशीर्वाद से इस पृथ्वी पर कोई भी क्षत्रिय युद्ध में तुम्हारे समान नहीं होगा।॥31-32॥
 
'The Brahmastra can never remain stable in the heart of one who is not a Brahmin. Now you go away from here. There is no place here for you, a liar, but with my blessings, no Kshatriya on this earth will be your equal in battle.'॥ 31-32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)