Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.3.16-17: उस राक्षस ने पूर्ण इच्छा से हाथ जोड़कर परशुरामजी से कहा - 'भृगुश्रेष्ठ! आपका कल्याण हो। मैं जिस मार्ग से आया हूँ, उसी मार्ग से लौट जाऊँगा। मुनिप्रवर! आपने मुझे इस नरक से मुक्त कर दिया है। आपका कल्याण हो। मैं आपको प्रणाम करता हूँ। आपने मेरा बहुत प्रिय कार्य किया है।'॥16-17॥ | mahabharat अध्याय 12.3: कर्णको ब्रह्मास्त्रकी प्राप्ति और परशुरामजीका शाप । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
स रामं प्राञ्जलिर्भूत्वा बभाषे पूर्णमानस:।
स्वस्ति ते भृगुशार्दूल गमिष्येऽहं यथागतम्॥ १६॥
मोक्षितो नरकादस्माद् भवता मुनिसत्तम।
भद्रं तवास्तु वन्दे त्वां प्रियं मे भवता कृतम्॥ १७॥
अनुवाद
उस राक्षस ने पूर्ण इच्छा से हाथ जोड़कर परशुरामजी से कहा - 'भृगुश्रेष्ठ! आपका कल्याण हो। मैं जिस मार्ग से आया हूँ, उसी मार्ग से लौट जाऊँगा। मुनिप्रवर! आपने मुझे इस नरक से मुक्त कर दिया है। आपका कल्याण हो। मैं आपको प्रणाम करता हूँ। आपने मेरा बहुत प्रिय कार्य किया है।'॥16-17॥
With full desire, that demon folded his hands and said to Parshuramji - 'Bhrigu Shrestha! May you be blessed. I will return the same way I came. Munipravar! You have freed me from this hell. May you be blessed. I salute you. You have done a very dear work to me.'॥ 16-17॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥